इस बार असली टॉपर ने बिहार बोर्ड के फटीचर एजुकेशन सिस्टम को थप्पड़ मारा है, साथ ही नया विकल्प भी मिला है

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शिवहर की बेटी कल्पना कुमारी को बिहार इंटर  टॉपर व नीट में भारत टॉपर होने पर हमें गर्व है | इसकी मेधा को कोई फर्जी नहीं कह सकता है , लेकिन सरकार की ढुलमुल नीति पर सवालिया निशान लग गया है. 75% अटेंडेंस के मानदंड नहीं पूरे होने के कारण सैकड़ों छात्र फार्म भरने व परीक्षा देने से वंचित हो गए होंगे | हालांकि कल्पना के ज्ञान और मेरिट के पीछे बिहार बोर्ड अपनी चौपट एजुकेशन सिस्टम को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रहा है. स्कूल में उपस्थिति के नियम पर बिहार बोर्ड के चेयरमैन आनंद किशोर के बदलते बयान ही हकीकत बताने को काफी हैं.

कल्पना बिहार बोर्ड इंटर टॉपर

बिहार के माध्यमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था पर शिक्षकों के वेतन, उपस्कर, अन्य सारे फंड के नाम पर करोड़ों रूपये पानी की तरह बहाया जाता है | इसकी जरूरत ही क्या है ? जब छात्र व छात्रा सरकारी स्कूलों में बिना पढ़े भारत टॉपर व बिहार टॉपर हो सकते हैं. बहुत से ऐसे छात्र व छात्राएं भी हैं जो बेहतर भविष्य के लिए अच्छे संस्थानमें दाखिला चाहते हैं लेकिन 75 % उपस्थिति के पारामीटर के डर से उसी संस्थान में पढ़ने को विवश हो जाते हैं. जहाँ शिक्षा की मुलभुत सुविधा भी उपलब्ध नहीं होती. अगर यही कानून के चक्कर में कल्पना यदि उसी सरकारी स्कूल में 2 वर्ष तक पढाई करती तो क्या वह नीट परीक्षा और इंटर परीक्षा में टॉपर बन पाती ?

धनंजय कुमार झा, संपादक

कल्पना के केस ने तो बिहार बोर्ड के एजुकेशन सिस्टम पर तमाचा सा जड़ दिया है. कल्पना के मामले ने पैरवी पैगाम, जुगाड़ और ख़राब शिक्षा व्यवस्था को एक ही बार में दुनिया के सामने ला दिया है. लेकिन कई ऐसे छात्र भी होंगे जो ऐसा नहीं कर सके. उनका भविष्य इसी उधेड़बुन में अटक कर राह गया कि वे 75% अटेंडेंस पूरा करे या फिर अच्छी पढाई पर ध्यान दे.

जब आकाश जैसे ब्रांडेड अन्य संस्थानो में पढ़ कर ही बिहार टॉपर व भारत टॉपर हो सकते हैं तो फिर सरकार नाजायज खर्च क्यों कर रही है ? आकाश जैसे अन्य संस्थानों को ही क्यों नहीं सरकारी मदद देकर प्रोत्साहित करते हुए अन्य संस्थान को फ्रेंचाइजी देकर सभी शहरों व ग्रामीण विद्यार्थी के भविष्य को संवारा जा सके | आज विद्वान और मेधावी युवा शिक्षक वैसे संस्थान में अपना  योगदान देकर बच्चे का भविष्य बना रहे हैं | सरकार की औकात ही नहीं है कि वैसे योग्य कर्मी को रख पायेंगें | सरकार की कुव्यवस्था के कारण अयोग्य से अयोग्य शिक्षक पैरवी पहुँच लगाकर शिक्षा को चौपट कर रहे हैं. जिसके कारण मेधावी छात्र को सरकारी संस्थान से विश्वास ही उठ गया है | अब यह सरकारी संस्थान सिर्फ पंजीकरण और परीक्षाकेंद्र का एक आनंद उठाने का एक स्थान रह गया है |

दूसरी तरफ आरक्षण की लाठी की मार से योग्य मेधावी युवा सडक पर भटक रहा है | ऐसे युवक अगर अपनी संस्थान चलाते हैं तो उस पर भी सरकार अंकुश लगाती है | सरकार कि मंशा हीं गलत है ताकि मेधावी छात्र न होगा न हमें तंग करेगा | सच में जितने भी मेधावी छात्र तैयार होते हैं उसमें एक भी सरकारी शिक्षक का कोई योगदान नहीं है | वे सभी वैसे बेरोजगार मेधावी शिक्षक की देन है जो अभी सरकार की गलत आरक्षण नीति के कारण सड़क पर  है|

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