आज से पितर पक्ष, जानें इससे जुड़ी खास बातें

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TheSameExp Desk ; 5 सितंबर से पितृपक्ष की शुरुआत हो चुकी है यह पितर पक्ष 16 दिन तक चलेगा. इस वक्त सूर्य दक्षिणायन होता है. शास्त्रों के अनुसार, सूर्य इस दौरान पितरों की आत्माओं को मुक्ति का मार्ग देता है. कहा जाता है कि इसीलिए पितर अपने दिवंगत होने की तिथि के दिन, बेटे या पोतों से उम्मीद रखते हैं कि कोई श्रद्धापूर्वक उनके उद्धार के लिए पिंडदान तर्पण और श्राद्ध करें.

हालांकि ऐसा करते हुए बहुत-सी बातों का ख्याल रखना भी जरूरी है. जैसे श्राद्ध का वक्त तब होता है जब सूर्य की छाया पैरों पर पड़ने लगे. यानी दोपहर के बाद ही श्राद्ध करना चाहिए. सुबह-सुबह या 12 बजे से पहले किया गया श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुंचता है. आगे की स्लाइड्स में जानें पितृपक्ष से जुड़ी कुछ अन्य अहम बातें…

पितरों को खुश करना सबसे ज्यादा कल्याणकारी माना गया है। देवकार्य से भी ज्यादा पितृकार्य का महत्व होता है। वायु पुराण, मत्स्य पुराण, गरुण पुराण, विष्णु पुराण आदि पुराणों और अन्य शास्त्रों जैसे मनुस्मृति में भी श्राद्ध कर्म के महत्व के बारे में बताया गया है। पूर्णिमा से लेकर अमावस्या के बीच की अवधि में पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए कार्य किए जाते हैं। पूरे 16 दिन नियमपूर्वक कार्य करने से पितृ-ऋण से मुक्ति मिलती है। इस दौरान ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति दान-दक्षिणा दी जाती है।

श्राद्ध कर्म द्वारा पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार पिंडदान, तर्पण आदि करने से पितृ दोष से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। यदि किसी को अपने पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो अमावस्या तिथि के दिन वे अपने पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं और पितृदोष की शांति करा सकते हैं।
तैत्रीय संहिता के अनुसार, पूर्वजों की पूजा हमेशा, दाएं कंधे में जनेऊ डालकर और दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके ही करनी चाहिए। माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत में दिशाएं देवताओं, मनुष्यों और रुद्रों में बंट गई थीं, इसमें दक्षिण दिशा पितरों के हिस्से में आई थी।

कौए को पितरों का रूप माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर दोपहर के समय हमारे घर आते हैं। अगर उन्हें श्राद्ध नहीं मिलता तो वे नाराज हो जाते हैं। इस कारण श्राद्ध का प्रथम अंश कौओं को दिया जाता है। तार्किक लोग इसे इंसान को नेचर से जोड़े रखने के प्रयास में उठाए गए एक कदम की तरह देखते हैं। अपने हर संस्कार में पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं को जोड़े रखने से उनका संरक्षण आसान हो जाता है। आगे की स्लाइड में जानें शास्त्रों में पिंडदान हेतु विशेष स्थान…

शास्त्रों में पिंडदान के लिए 3 जगहों को सबसे विशेष माना गया है। पहली है बदरीनाथ, जहां ब्रह्मकपाल सिद्ध क्षेत्र में पितृदोष मुक्ति के लिए तर्पण का विधान है। दूसरी है हरिद्वार, जहां नारायणी शिला के पास लोग पूर्वजों का पिंडदान करते हैं। तीसरी है गया, जहां साल में एक बार 16 दिन के लिए पितृपक्ष मेला लगता है। कहा जाता है पितृ पक्ष में फल्गु नदी के तट पर विष्णुपद मंदिर के करीब और अक्षयवट के पास पिंडदान करने से पूर्वजों को मुक्ति मिलती है।

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