पढ़िए संपादक धनंजय कुमार झा का सम्पादकीय लेख : बिहार की अपंग शिक्षा नीति

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सम्पादकीय : बिहार की शिक्षा नीति के तहत शिक्षा के विकास के लिए पूर्वमुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर ने सोचा था कि अंग्रेजी को अगर सिलेबस से हटा दिया जाए तो दलित व पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थी अधिक संख्या में पढ़ने लगेंगे,आरक्षण के कोटे भरने लगेंगे,अंग्रेजी सबसे बड़ा बाधक है | इन्होंने 1980 में अंग्रेजी को हटा दिया ,इतना हीं नहीं 1980 के पूर्व के जितने भी फेल,कमजोर छात्र थे सबों को उत्तीर्ण करने का आदेश दे दिए,अर्थात परीक्षा में इतनी छूट दो कि एक भी पुराना विद्यार्थी बचे नहीं | 1981 से नयी शिक्षा नीति लागू हुआ जिसमें आर्ट साइंस कॉमर्स तीनों को एक कर दिया गया और तीनों विषयों को सबों को पढ़ना पड़ता था और अभी भी है , खैर इससे कोई मतलब नहीं ,इसे एक नजर से देखा जाए तो छात्र के हित में उपयोगी है |

रहा सवाल शिक्षा नीति का तो यह दिनानुदिन चौपट होते गया इसे हम यह कह सकते हैं कि शिक्षा कि स्थिति दिन दूनी रात चौगुनी के हिसाब से बद से बदतर होता चला गया | आज अंग्रेजी हटाने का दुष्परिणाम विद्यार्थी भोग रहा है | बड़े घराने के बच्चे अर्थात बड़े जाति नहीं राजनेता,सभी पदाधिकारी ,सभी कर्मचारी ,सभी बिजनेस मेन चाहे जाति कोई भी हो उनका बच्चा तो बड़े या छोटे अंग्रेजी स्कूल में तो पढ़ ही लेते है ,उनके बच्चे तो नर्सरी से ही अंग्रेजी पढ़ लेते हैं जिससे उनको आगे किसी प्रकार की कोई कठनाई नहीं होती है , पिसता तो है गरीब का बच्चा जिसे उचित भोजन भी नहीं नसीब होता है |

सरकार तो डंके की चोट पर  भिन्न भिन्न स्लोगन देकर , प्रभात फेरी करवाकर प्रचार करवाती है कि हम मुफ्त शिक्षा जनता को दे रहे हैं फिर भी बच्चे स्कूल क्यों नहीं जातें है ?आज से नहीं कई साल से जनता के दिल में यह सवाल उठ रहा है कि किसके माध्यम से अपना भड़ास निकालकर उन सबों को सुनाऊँ तो उनकी ये आवाज है ,अरे चालाक नेता और धोखेबाज पदाधिकारी पहले तुम अपने बच्चे को  क्यों नहीं सरकारी स्कूल में दाखिले देते हो,क्यों नहीं पढवाते हो ,भोली भाली जनता को मूर्ख बनाते हो तुम तो स्वयं अपने हीं बनाए क़ानून से घृणा करते हो | काले कमाई से धनवान होने वाले का तो हमेंशा से सोच यही रहा है कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे का मतलब है कि वह निम्न और गिरा परिवार का बच्चा |

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