ये हैं चारा घोटाले को उजागर करने वाले 5 ईमानदार अफसर,लालू पर सजा का एलान आज

Biggest News, BIHAR, Breaking News

रांची : बिहार में अगर कोई सबसे चर्चित घोटाला माना जाता है तो वह है चारा घोटाला जिसकी वजह से आज लालू जेल की हवा खा रहे रहे हैं |लेकिन इस घोटाले को उजागर करने वाले 5 ईमानदार अफसर को बहुत कम लोग ही जानते होंगे |

2013 में चाईबासा ट्रेजरी केस और दिसंबर 2017 में देवघर ट्रेजरी केस में रांची की विशेष सीबीआई कोर्ट ने लालू को दोषी करार दिया था। एक नजर उन पांच अफसरों पर, जिन्होंने इस घोटाले का पर्दाफाश किया।

1. अमित खरे 
तब- डेप्युटी कमिश्नर, वेस्ट सिंहभूम जिला (चाईबासा)
अब- अडिशनल चीफ सेक्रटरी, डिवेलपमेंट कमिश्नर, झारखंड सरकार
भूमिका- खरे पहले ऐसे अफसर थे, जिन्होंने पशुपालन विभाग के राजकोष (ट्रेजरी) से पैसों के लेन-देन में गड़बड़ी का अंदेशा जताया। ट्रेजरी से होने वाले ट्रांजैक्शन की वह अकाउंटेंट जनरल ऑफिस में हर महीने रिपोर्ट भेजते थे। उन्होंने पाया कि लगातार बड़ी रकम के बिल पास हो रहे हैं। इसके बाद खरे ने चारे की सप्लाइ करने वालों और जिला पशुपालन अफसर के यहां छापा मारने की ठान ली। उन्होंने पहले दौर की जांच के लिए टीम बनाई और कामयाबी पाई।

2. लाल एससी नाथ शाहदेव
तब- अडिशनल डेप्युटी कमिश्नर (एडीएम), वेस्ट सिंहभूम जिला (चाईबासा)
अब- रिटायर्ड, गुमला जिले के पालकोट में रहते हैं
भूमिका- शुरुआती छापों के बाद शाहदेव को पशुपालन विभाग के बिल की जांच सौंपने के साथ ही उनका ट्रेजरी के अकाउंट से मिलान करने को कहा गया। इसके बाद फर्जी बिल का अंबार बरामद हुआ, जिनका इस्तेमाल पैसे निकालने के लिए हुआ था। जांच में यह विभाग के पूरे बजट से ज्यादा मिला। शाहदेव के पास बिलों के मिलान करने और फर्जीवाड़े का विवरण देने की बड़ी जिम्मेदारी थी।

3. वीएच राव देशमुख
तब- सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस (एसपी), वेस्ट सिंहभूम जिला (चाईबासा)
अब-डायरेक्टर (एडमिन), ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च ऐंड डिवेलपमेंट, केंद्रीय गृह मंत्रालय
भूमिका- तत्कालीन डेप्युटी कमिश्नर, वेस्ट सिंहभूम (चाईबासा) अमित खरे ने वीएच राव देशमुख को जब अपने पास बुलाया, तो उन्होंने छापेमारी का सुझाव दिया। देशमुख का कहना है, ‘मैंने स्थानीय पुलिस को अलर्ट किया और चारे की सप्लाई करने वालों के प्रतिष्ठानों पर छापे मारे, जहां हमें फर्जी बिल के अलावा ट्रेजरी अफसरों के स्टैंप और दस्तावेज मिले। सप्लायर्स, पशुपालन विभाग और ट्रेजरी विभाग के अधिकारियों के बीच मिलीभगत को साबित करने के लिए ये काफी अहम सबूत थे। इस मामले में जो पहली एफआईआर दर्ज हुई वही बाद में चारा घोटाले के नाम से जानी गई। उस वक्त हमें यह अंदाजा नहीं था कि इस घोटाले में इतने बड़े नाम शामिल हो सकते हैं। हमारे लिए यह सरकारी खजाने से गलत तरीके से पैसों की निकासी रोकने के लिए किसी सामान्य छापे की तरह था। हम सप्लायर्स के पास से कैश के साथ ही ट्रेजरी बिल और स्टैंप बरामद करने में कामयाब रहे। इसके बाद हमने ताबड़तोड़ छापे मारते हुए घोटाले में शामिल अफसरों को सबूत नष्ट करने से रोका।’

 4. फिडलिस टोप्पो 
तब- सब डिविजनल ऑफिसर, सदर, वेस्ट सिंहभूम जिला
अब- रिटायरमेंट के बाद झारखंड लोकसेवा आयोग (JPSC) के सदस्य नियुक्त
भूमिका- चारा घोटाले का जिक्र करते हुए फिडलिस ने हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, ‘छापे मारने की बात को गुप्त रखा गया था और इस बारे में डेप्युटी कमिश्नर वेस्ट सिंहभूम अमित खरे के नेतृत्व में काम कर रहे अफसरों को ही पता था। मैं उनका जूनियर था, लिहाजा उनके मुताबिक आदेश का पालन करने के लिए पूरी तरह से तैयार था। छापों के वक्त हमारे ऊपर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था लेकिन जब हमें फर्जी बिल और अलॉटमेंट ऑर्डर की कॉपी मिली, तो हैरान रह गए। हमने सप्लायर्स और अफसरों के घर से काफी कैश जब्त किया। कुछ जगहों पर रेड के दौरान हमारे दस्तावेज भी मिले।’


5. बिनोद चंद्र झा 

तब- एग्जिक्युटिव मैजिस्ट्रेट
अब- आईएएस रैंक पर रिटायर होने से पहले झारखंड सरकार में जांच अधिकारी और विभागीय कार्यवाही का हिस्सा रहे
भूमिका- बतौर एग्जिक्युटिव मैजिस्ट्रेट उन्होंने छापे मारने वाली टीम को सहयोग दिया और सर्च ऑपरेशन की निगरानी की। तत्कालीन सब डिविजनल ऑफिसर फिडलिस टोप्पो के मुताबिक बिनोद चंद्र झा समेत टीम में शामिल हर अफसर बेहद ईमानदार थे। किसी नई जगह पर छापेमारी और जब्त करने की कार्रवाई से पहले झा अपनी तरफ से कानूनी औपचारिकताओं को समय रहते ही पूरा कर लेते थे।

 

Leave a Reply